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पशुधन पर ध्यान

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प्रद्युम्न तिवारी।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को मथुरा में दुधारू पशुओं की गंभीर बीमारियों के खिलाफ एक सार्थक योजना की शुरूआत की है। यह टीकाकरण योजना गाय समेत सभी दुधारू पशुओं के लिए लाभकारी होगी। प्रधानमंत्री ने राष्ट्रीय पशु आरोग्य मिशन की शुरूआत करते हुए कहा कि पशुधन आदिकाल से भारत की अर्थव्यवस्था का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रहा है। पशुधन के बिना भारत के गांवों की आर्थिक स्थिति में सुधार के बारे में कल्पना भी नहीं की जा सकती है। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण को पूरे देश के लिए प्रेरणा स्रोत बताते हुए कहा कि मथुरा वासियों ने हमेशा से प्रकृति व पशुओं के संरक्षण, स्वास्थ्य और संवर्धन की दिशा में काम किया है। यहां प्रधानमंत्री ने गाय के बहाने विपक्ष पर भी तीखा हमला किया। उन्‍होंने कहा कि कुछ लोगों के कान में गाय शब्‍द पड़ता है तो उनके बाल खड़े हो जाते हैं। उनको लगता है कि देश 16वीं-17वीं सदी में चला गया है। मोदी के इस बयान पर विपक्ष ने भी काफी तीखी प्रतिक्रियाएं दीं। यह तो रही राजनीति की बात, मगर यही सच है कि गाय की बात करने से देश पीछे नहीं जाता, आगे बढ़ता है। विदेशों में भी आज पशुधन के संरक्षण और दुधारू पशुओं के संवर्धन की दिशा में बड़े प्रयास किए जा रहे हैं।

भारत में दुधारू पशुओं, खास तौर पर गाय का प्राचीनकाल से ही विशेष स्थान रहा है। भागवत पुराण में समुद्र मंथन से कामधेनु के उत्पत्ति की बात कही जाती है। कामधेनु को हिन्दू धर्म में देवी माना गया है। जिसका स्वरूप गाय का है। मान्यता है कि कामधेनु जिसके पास होती है वह जो कुछ कामना करता है उसे वह मिल जाता है। देश में वैदिक काल से ही अर्थव्यवस्था में गाय का विशेष महत्त्व रहा है। शुरुआत में लेन-देन और विनिमय के माध्यम के रूप में भी गाय उपयोग होता रहा था। किसी व्यक्ति की समृद्धि की तुलना उसकी पाली हुई गायों की संख्या से की जाती थी। इतना ही नहीं पैगंबर हजरत मुहम्मद साहब का कहना है कि गाय का दूध और घी इंसान की तन्दुरूस्ती के लिए बहुत जरूरी है। इसका गोश्त नुकसानदेह है और वह बीमारी पैदा करता है, जबकि इसका दूध दवा है। हजरत मुहम्मद ने बेगम हजरत आयशा से कहा था कि गाय का दूध बदन की खूबसूरती एवं तन्दुरूस्ती को बढ़ाने का जरिया है।

कड़वी सच्चाई तो यह है कि जिस देश में वैदिक काल से गाय का बड़ा महत्व रहा हो, जहां उसका दर्जा मां के समान बताया जाता हो, उसी देश में गाय या दुधारू पशुओं के रखरखाव के स्तर पर हम दुनिया के कई देशों के मुकाबले काफी पीछे हैं। इसका सही उदाहरण देखना हो तो सड़कों पर विचरती गायों को देखें, गोशालाओं की दशा देखें। कचरे में खाना ढूंढती जाने कितनी गायों की पालिथीन खा कर जान चली जाती है। हमारे डेयरी फार्मों में भी हाईजीन का कोई ख्याल नहीं रखा जाता है। प्रधान मंत्री ने मथुरा में कहा कि पालिथीन का गायों की सेहत पर काफी बुरा असर पड़ रहा है। जहां उन्होंने 1059 करोड़ की पशुधन संबंधी योजनाओं का लोकार्पण-शिलान्यास किया वहीं 13 हजार करोड़ की पशु टीकाकरण योजना की भी घोषणा की। इसके तहत 51 करोड़ दुधारू पशुओं को साल में दो बार गंभीर बीमारियों से बचाव के लिए टीके लगाए जाएंगे। यह सब सार्थक पहल है। जरूरत अब इसकी है कि सरकार हो या विपक्ष, गाय पर राजनीति बंद कर सकारात्मक पहल शुरू करें।

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