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दिल्ली विधानसभा चुनाव में नाम पर भारी पड़ा काम

आम आदमी पार्टी फिर से पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है। बीजेपी के धुंआधार प्रचार और बड़े बड़े दावों की पोल तो खुली ही साथ ही यह साबित हो गया कि दिल्ली के चुनाव में नाम पर काम भारी पड़ा।

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आम आदमी पार्टी फिर से पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने जा रही है। बीजेपी के धुंआधार प्रचार और बड़े बड़े दावों की पोल तो खुली ही साथ ही यह साबित हो गया कि दिल्ली के चुनाव में नाम पर काम भारी पड़ा। अमित शाह, नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ समेत भाजपा के कई बड़े नामों ने दिल्ली के चुनाव प्रचार की कमान संभाली पर नतीजा उनकी उम्मीदों के विपरीत रहा।

भाजपा की करारी शिकस्त के पीछे पहला और प्रमुख कारण प्रचार में उठाए गए मुद्दे रहे। भाजपा के चुनावी प्रचार पर स्थानीय मुद्दों की बजाय राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय मुद्दों का ही जिक्र हावी रहा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने हर रैली में अनुच्छेद 370, राम मंदिर और सर्जिकल स्ट्राइक-एयर स्ट्राइक का राग अलापा। वहीं आम आदमी पार्टी का पूरा जोर शिक्षा, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों पर रहा। जहां अरविंद केजरीवाल ने चुनाव से पहले 5 साल के अपने कार्यों का रिपोर्ट कार्ड भी पेश किया वहीं भाजपा सीएए-शाहीन बाग और राष्ट्रवाद पर ही उलझी रही।

एक और कारण यह भी था कि केजरीवाल के मुकाबले भाजपा के पास कोई स्थानीय चेहरा नहीं था। 2015 में भाजपा ने किरण बेदी को मुख्यमंत्री उम्मीदवार बनाया था, लेकिन इससे उसे बहुत ज्यादा नुकसान हुआ। इसी वजह से इस बार दिल्ली में पार्टी ने मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित नहीं किया। भाजपा मोदी के नाम पर चुनाव लड़ रही थी, लेकिन यह विधानसभा चुनाव था, इसलिए मोदी के नाम पर काम भारी पड़ गया।

तीसरा कारण यह भी माना जा सकता है कि कांग्रेस लड़ाई में कहीं दिखी ही नहीं। उसके उम्मीदवारों और स्टार प्रचारकों ने भी कोई दमखम नहीं लगाया। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वोटिंग से चार दिन पहले रैली करने आए भी तो उसमें भी मोदी ही उनके निशाने पर रहे।

चौथा कारण यह भी नजर आता है कि चुनाव प्रचार के दौरान मोदी और अमित शाह शाहीन बाग में चल रहे प्रदर्शन के लिए आप को जिम्मेदार ठहराया। लेकिन केजरीवाल ने जवाब दिया कि अगर दिल्ली पुलिस उनके हाथ में होती, तो दो घंटे में शाहीन बाग का रास्ता खुलवा देते। भाजपा पूरे चुनाव में शाहीन बाग और सीएए का मुद्दा उठाती रही, लेकिन आप ने इससे दूरी बनाए रखी।

इसके अलावा उन विकास कार्यों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता जो आप को दोबारा सत्ता में लाने का कारण बने। जैसे शिक्षा के क्षेत्र में किए गए काम। केजरीवाल ने सरकार में आते ही सबसे पहले प्राइवेट स्कूलों को मनमानी फीस बढ़ाने से रोका। सरकार के इस फैसले के खिलाफ प्राइवेट स्कूल हाईकोर्ट भी गए, जहां केजरीवाल सरकार के इस फैसले को रद्द कर दिया गया। इसके बाद केजरीवाल सरकार ने इस फैसले को चुनौती दी और दो जजों की बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी। केजरीवाल सरकार ने एक तरफ प्राइवेट स्कूलों को मनमानी फीस बढ़ाने से रोका तो दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों पर भी फोकस किया। शिक्षा बजट 6,600 करोड़ रुपए से बढ़ाकर15,600 करोड़ रुपए किया। केजरीवाल ने दावा किया कि कई पैरेंट्स अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल से निकालकर सरकारी स्कूल भेज रहे हैं।

बिजली-पानी और स्वास्थ जैसी मौलिक आप सरकार का खास फोकस रहा। केजरीवाल सरकार ने 6 महीने पहले ही 200 यूनिट तक की बिजली फ्री देने की घोषणा की थी। जबकि 201 से 400 यूनिट तक की बिजली इस्तेमाल करने वालों को 50त्न सब्सिडी देने का ऐलान किया। इससे 40 लाख से ज्यादा लोगों को सीधा फायदा हुआ। सरकार ने हर महीने लोगों को 20 हजार लीटर पानी फ्री देने से 14 लाख लोग लाभान्वित हुए।

लोगों को सस्ता और अच्छा इलाज मुहैया करने के मकसद से केजरीवाल सरकार ने 400 से ज्यादा मोहल्ला क्लीनिक खोलीं। संयुक्त राष्ट्र के पूर्व सचिव जनरल कोफी अन्नान और डब्ल्यूएचओ के डीजी डॉ. ग्रो हार्लेम ब्रुंडलैंट ने भी मोहल्ला क्लीनिक की तारीफ की थी। चुनाव से तीन महीने पहले आप सरकार ने डीटीसी बसों और मेट्रो में महिलाओं के सफर को फ्री किया। रिपोर्ट कार्ड में दावा किया कि सरकार ने पांच साल में 1,797 में से 1,281 कॉलोनियों में सड़कें बनाईं, जबकि 1130 कॉलोनियों में सीवर लाइनें बिछाईं।

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